Friday, April 17, 2009
आज बातें २ वेबसाइट के बारे में ...
पहली वेबसाइट है : http://www.indianblooddonors.com/
यहाँ आप अपने रक्त के ग्रुप और contact detail रजिस्टर कर सकते हैं और फिर जरूरतमंद लोग आपको संपर्क कर सकते हैं. दूसरी सुविधा इस वेबसाइट पर ये भी है की आप यहाँ अपना request पोस्ट कर सकते हैं और शायद कोई आपका request देख कर आपसे संपर्क करें....मैं तो कहूँगा आप बुकमार्क कर लें इस वेबसाइट को हर दिन सुबह एक बार देखिये और पता कीजये आज कहीं आपके शहर में किसी को आपके ब्लड ग्रुप के ब्लड की जरुरत तो नहीं है...अगर है और आप देने में इच्छुक है तो जायिए और उनकी मदद कीजये....
दूसरी वेबसाइट है : http://www.givemedicines.org/
जैसा की अक्सर होता है डॉक्टर साहब बहुत सारा दवा लिखे देते हैं और फिर अंत में दवा ख़त्म होने से पहले हम भले-चंगे हो जाते हैं और फिर बची हुई दवा का आप क्या करते हैं? अक्सर ये बची दवाएं बर्बाद हो जाती है ..
तो आप इन बची दवाओं से किसी गरीब की जान बचा सकते हैं अरे हाँ भाई मैं मजाक नहीं कर रहा हूँ...आप इस वेबसाइट पर दिए गए किसी भी NGOं को अपनी बची हुई दवाएं दे सकते हैं और वो इन दवाओं को जरुरत के मुताबिक गरीबों के ये दवा दे सकते हैं ....
इस मुहीम को ज्यादा-से-ज्यादा सफल बनाने के लिए हमें २ काम करना होगा:
पहला की जो दवा ले उसका expiry date नोट कर के रखें और हो सके तो सबसे आखिर में आप expiry date लिखा हुआ हिस्सा इस्तेमाल करें . ये बहुत जरुरी है की हम expiry date का ध्यान रखें .
और दूसरा आप इस वेबसाइट से ज्यादा-से-ज्यादा अच्छे NGOsं को जोडें ....
तो बताईएगा कैसा लगा जानकार इन दोनों वेबसाइट के बारे में ...आप भी जुड़े इस मुहीम से और अपने मित्रों अवं रिश्तेदारों को भी जोडें...
प्यार बाटते चलो...
Friday, March 13, 2009
अनीता की मधुमक्खियाँ
Wednesday, March 11, 2009
Monday, March 09, 2009
महिला दिवस पर विशेष
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वाह धनेसरी! श्रमदान से बनवा दी सड़क
गोरखपुर, [ब्रह्मदेव पाण्डेय]। धनेसरी देवी फौलादी संकल्प का प्रतीक हैं। अक्षर नहीं पहचाती फिर भी पढ़े लिखों के कान काटती है। एक पिछड़े गांव को अपनी कोशिशों से सुविधा संपन्न कर दिया। बिजली, पानी, सड़क और स्कूल सब कुछ है। गांव भर को बटोरा और श्रमदान से गांव को जोड़ने वाली डेढ़ किमी सड़क बनवा दी। घनेसरी की कोशिशों से बीस गांवों की 18 सौ महिलाएं डेढ़ सौ समूहों में संगठित हो विकास की दौड़ में शामिल हैं। गरीबों के दरवाजे न फटकने वाले बैंक और बीडीओ तक धनेसरी से सलाह मशविरा करते हैं।
धनेसरी न ग्राम प्रधान है और न बीडीसी या जिला पंचायत सदस्य। फिर भी उसका जनाधार व्यापक है। यह उसकी सेवा और लगन से बना है। एक ऐसी आम महिला जिसने गरीबी से लड़ते हुए न सिर्फ अपने कुनबे को इससे निजात दिलाई, बल्कि अपने जैसी बहुतेरी गरीब महिलाओं को भी खुशहाली का रास्ता दिखाया।
सरदारनगर के ग्रामसभा अवधपुर शांति टोला की निवासी धनेसरी के पति राम नरायन कुर्मी कभी बेरोजगार थे। अब उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं।
धनेसरी की पहलकदमी 1992 में गांव जाने वाली एक सड़क के निर्माण के लिए श्रमदान से शुरू हुई। सड़क बनने की खबर जब ब्लाक तक पहुंची तोतत्कालीन बीडीओ उससे मिले और उसे महिलाओं कासमूह बनाने को प्रेरित किया। धनेसरी ने एक समूह बनाया। उसके प्रयासों से गांव में एक प्राइमरी विद्यालय खुल गया। आज विद्यालय में तीन सौ से अधिक बच्चे पढ़ रहे हैं।
समूह का खाता खोलने में पहले बैंकों ने कई चक्कर लगवाया, पर धनेसरी का जज्बा देख बैंक अधिकारी खुद गांव आए और समूह का खाता खोला। शुरुआती दौर में दो सौ बीस रुपये से खाता खुला आज समूह के पास कई लाख की पूंजी है। समूह के पास अपनी मारुति कार है। अब बैंक समूह की सदस्यों को कर्ज देने में नहीं हिचकते।
धनेसरी देवी के प्रयास से इस समय बीस गांवों में डेढ़ सौ स्वयं सहायता समूह काम कर रहे हैं। इनमें 18 सौ महिलाएं जुड़ी हैं। इन समूहों ने ब्लाक तथा एनजीओ के सहयोग से करीब एक लाख पौधों का रोपण भी किया है। यही नहीं जैविक खेती में सहायक केंचुआ का पालन भी कर रही हैं।
समूह की महिलाएं नरेगा के तहत जल संरक्षण पर भी काम कर रही है। धनेसरी देवी के पास जहां एक झोपड़ी भी ढंग की नहीं थी आज पक्का मकान है। खास बात यह है कि धनेसरी ने अकेले नहीं सैकड़ों परिवारों के साथ विकास के पथ पर यात्रा शुरू की है।
एक और समाचार जो मेरे दिल को छू गयी ...एक और पिंकी ने दिखाया कमाल....
राष्ट्रपति को भाया पिंकी का पाउच पर्स
नई दिल्ली। कहते हैं न कि एक न दिन तो घूरे के दिन भी फिरते हैं, सो फिर गए घूरे के दिन और वह उठकर और कहीं नहीं सीधे पहुंच गया राष्ट्रपति भवन।
पिंकी की नन्हीं-नन्हीं उंगलियों से जिस घूरे यानी कूड़े के दिन फिरे वो है सड़कों के किनारे यहां-वहां बिखरे रहने वाले पान मसाले के खाली पाउच और प्लास्टिक की थैलियां। पिंकी ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के लिए पान मसाले के खाली पाउचों को स्नेह और हसरतों से गूंथ-गूंथ कर बनाया और चमचमाता पर्स उन्हें भेंट किया तो राष्ट्रपति भाव-विभोर हो गई और पिंकी को गले लगा लिया।
दरअसल दसवीं की परीक्षा की तैयारी कर रही छत्तीसगढ़ की पिंकी ने राष्ट्रपति को खत लिखकर बताया था कि कैसे उसका भाई सड़कों पर पड़े पान मसालों के पाउचों और प्लास्टिक की थैलियों को इकट्ठा करता है और फिर वह उन्हें धो-सुखाकर किस तरह गूंथकर दरियों, पायदान व पर्स आदि की शक्ल देता है। उसने यह भी लिखा कि वह इस तरह रोजी तो कमाती ही है साथ ही प्लास्टिक के कचरे को ठिकाने लगाने में भी योगदान दे रही है।
पिंकी के इस पत्र से राष्ट्रपति इतनी प्रभावित हुई कि उन्होंने उसे राष्ट्रपति भवन आकर उनसे मिलने का न्यौता दिया और वह भी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर। इस मौके पर राष्ट्रपति ने पिंकी को दस हजार रूपये का इनाम दिया और साथ ही उसे इसे रोजगार के रूप में अपनाने में मदद का आश्वासन भी दिया। स्वयं राष्ट्रपति भवन आकर राष्ट्रपति से मिलने और स्वयं सहायता समूह के माध्यम से अपने इस हुनर को रोजी-रोटी का जरिया बनाने के लिए राष्ट्रपति द्वारा दी गई मदद की खुशी पिंकी के चेहरे से साफ छलक रही थी।
वैसे आपलोगों को जल्द हिन् कुछ और ऐसे किस्सों से हम रूबरू करवाएंगे ... सबको महिला दिवस की शुभकामनाएंें और आयिए हम संकल्प करें की किसी भी जरुरत मंद महिला या बच्ची को हर संभव सहायता दें और उन्हें सफलता के मार्ग की और प्रसस्त्र करें ...
Monday, February 23, 2009
पिंकी ने लहराया परचम आस्कर में ...
पर ये कहानी यहाँ शुरू होती है , आगे ऐसी कई पिंकी इस देश में हैं हमें उनका भी ध्यान रखना होगा . आकडों के मुताबिक भारत में तक़रीबन १० लाख ऐसे बच्चे हैं जो इस बीमारी से ग्रसित होते हैं, और हर साल ३५ हजार नए ऐसे बच्चे पैदा होते हैं ....बहुत बड़ी संख्या है हमारे यहाँ पिंकी की ...अगर हम सभी पिंकी को Smile Pinki बनाना चाहते हैं तो बहुत सारे डॉक्टर सुबोध और समाजसेवी पंकज की जरुरत होगी ....
आप हम अगर डॉक्टर नही हैं समाजसेवी भी नही पर अब इस चलचित्र को देखने के बाद इतना तो पता चल गया ना की ये बीमारी एक छोटे से सर्जरी से ठीक हो जाता है....तो जब भी कहीं आस-पास आपको कोई पिंकी दिखे तो मदद कीजये और उसे बनायिए Smile Pinki....
चित्र : साभार बीबीसी
Sunday, January 25, 2009
पिंकी ऑस्कर की दौड़ में ...
पिंकी नाम है एक गरीब बच्ची का जो अपने होठ ( cleft lip) की बीमारी के कारन समाज में बहिष्कृत थी , लोग उसे अछूत की श्रेणी में रखते थे . उसके गरीब परिवारवालों को क्या पता की इस बीमारी का इलाज सम्भव है . पिंकी जिंदगी में उजाला लेकर आए एक समाजसेवी पंकज जी . पंकज जी पिछले कुछ वर्षों से गाँव-गाँवं में घूमकर गरीब मरीजों की मदद करते हैं और उन्हें ऐसे अस्पताल में ले जाते हैं जहाँ मुफ्त चिकित्सा सेवा उपलब्ध होती है . ऐसे हिन् घुमते-घुमते पंकज जी को Mirjapur जिले के एक गाँव में पिंकी से मुलाकात हुई . उन्होंने फ़ौरन पिंकी को इलाज के लिए वाराणसी(बनारस) ले आए . वाराणसी में G S Memorial Plastic Surgery हॉस्पिटल के डॉक्टर सुबोध कुमार सिंह जी ने पिंकी की सर्जरी मुफ्त में किया . एक छोटे से operation से पिंकी के जीवन में नया उजाला आ गया आज पिंकी सभी बच्चों के साथ खेलती है स्कूल जाती है और अब तो उसके ऊपर बनी चलचित्र ऑस्कर भी चली गई .....पिंकी तुम ऐसे हिन् आगे बढो और जीवन में नई उचाईओं को छूओं और भविष्य में ऐसे सभी जरुरतमंदो की सहायता करो ....पर इस पुरे घटना कर्म में पंकज जी की जितनी भी तारीफ की जाए कम है . मैं कोशिश करूँगा की उनसे एक बार कम से कम हमारी मुलाकात हो. ऐसे लोग हमेशा हमें जीवन में कुछ नया करने की प्रेरणा दे जाते है .....
आप इस चलचित्र के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें ....
चित्र साभार : Zee news
Thursday, August 14, 2008
आशा को वोट करें : The Livelihood Programme for millions
http://www.membersproject.com/project/view/SQVEE2

कुछ और बात इस प्रोजेक्ट के बारे में ...
There are more than 10 million artisans globally who live under poverty, but their art and creation has always been the centre of attraction for masses. These artisans are also known for their dilapidated situation, declining traditional livelihoods and exploitation by the market-middlemen. Quite often they are landless. My model integrates the credit, production and marketing activities for these under privileged artisans; hence helping them to be independent, create sustainable livelihoods.
Our goal is to establish a platform that will facilitate to create sustainable livelihoods for these underprivileged artisans, particularly rural and women artisans and thereby, improve their economic and living conditions. The artisans are organized as self help groups; provided with orders and designs to fulfill the order and given credit to purchase raw materials. The production goes through a QA cycle. The artisans will be federated at the district level and organized as Producer Company.
Our primary objective is to increase the number of livelihoods and income levels by scaling up the businesses of the artisan groups. The organization will return all profits above a fair trade cost of production and operating costs to the artisans groups as investments in trainings, raw materials, more efficient modes of production and all that is needed to create lucrative, sustained livelihoods from their handicrafts production.
As been involved in various social organizations, I deeply feel the need of creating a social Infrastructure wherein these under privileged artisans get a platform to show their talent and create livelihood for themselves. I believe in the value of seeking to bring justice and hope to these artisans and at the same time bring in handicrafts that reflect and reinforce rich cultural traditions that are environmentally sensitive and appeal to our global consumers.
फिलहाल सारे प्रोजेक्टों में 'आशा' ka क्रमांक ५वा है हमें इसे प्रथम क्रमांक तक पहुचाना है , तो इसके लिए करना होगा आपको वोट आपका एक-एक वोट अमूल्य है तो देर ना करें इस नेक कार्य में ।
ताजा स्तिथि जानने के लिए यहाँ देखें
http://www.membersproject.com/search/top100.html?sortBy=supportCount
Last date for voting is : 30th August

