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Monday, March 09, 2009

महिला दिवस पर विशेष

महिला दिवस पर कुछ समाचार आपलोगों के साथ बाटना चाहता हूँ. आशा है आप सभी को अच्छा लगेगा . तो पढिये दैनिक जागरण की विशेष प्रस्तुति :
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वाह धनेसरी! श्रमदान से बनवा दी सड़क

Mar 09, 11:13 am

गोरखपुर, [ब्रह्मदेव पाण्डेय]। धनेसरी देवी फौलादी संकल्प का प्रतीक हैं। अक्षर नहीं पहचाती फिर भी पढ़े लिखों के कान काटती है। एक पिछड़े गांव को अपनी कोशिशों से सुविधा संपन्न कर दिया। बिजली, पानी, सड़क और स्कूल सब कुछ है। गांव भर को बटोरा और श्रमदान से गांव को जोड़ने वाली डेढ़ किमी सड़क बनवा दी। घनेसरी की कोशिशों से बीस गांवों की 18 सौ महिलाएं डेढ़ सौ समूहों में संगठित हो विकास की दौड़ में शामिल हैं। गरीबों के दरवाजे न फटकने वाले बैंक और बीडीओ तक धनेसरी से सलाह मशविरा करते हैं।

धनेसरी न ग्राम प्रधान है और न बीडीसी या जिला पंचायत सदस्य। फिर भी उसका जनाधार व्यापक है। यह उसकी सेवा और लगन से बना है। एक ऐसी आम महिला जिसने गरीबी से लड़ते हुए न सिर्फ अपने कुनबे को इससे निजात दिलाई, बल्कि अपने जैसी बहुतेरी गरीब महिलाओं को भी खुशहाली का रास्ता दिखाया।

सरदारनगर के ग्रामसभा अवधपुर शांति टोला की निवासी धनेसरी के पति राम नरायन कुर्मी कभी बेरोजगार थे। अब उसके साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं।

धनेसरी की पहलकदमी 1992 में गांव जाने वाली एक सड़क के निर्माण के लिए श्रमदान से शुरू हुई। सड़क बनने की खबर जब ब्लाक तक पहुंची तोतत्कालीन बीडीओ उससे मिले और उसे महिलाओं कासमूह बनाने को प्रेरित किया। धनेसरी ने एक समूह बनाया। उसके प्रयासों से गांव में एक प्राइमरी विद्यालय खुल गया। आज विद्यालय में तीन सौ से अधिक बच्चे पढ़ रहे हैं।

समूह का खाता खोलने में पहले बैंकों ने कई चक्कर लगवाया, पर धनेसरी का जज्बा देख बैंक अधिकारी खुद गांव आए और समूह का खाता खोला। शुरुआती दौर में दो सौ बीस रुपये से खाता खुला आज समूह के पास कई लाख की पूंजी है। समूह के पास अपनी मारुति कार है। अब बैंक समूह की सदस्यों को कर्ज देने में नहीं हिचकते।

धनेसरी देवी के प्रयास से इस समय बीस गांवों में डेढ़ सौ स्वयं सहायता समूह काम कर रहे हैं। इनमें 18 सौ महिलाएं जुड़ी हैं। इन समूहों ने ब्लाक तथा एनजीओ के सहयोग से करीब एक लाख पौधों का रोपण भी किया है। यही नहीं जैविक खेती में सहायक केंचुआ का पालन भी कर रही हैं।

समूह की महिलाएं नरेगा के तहत जल संरक्षण पर भी काम कर रही है। धनेसरी देवी के पास जहां एक झोपड़ी भी ढंग की नहीं थी आज पक्का मकान है। खास बात यह है कि धनेसरी ने अकेले नहीं सैकड़ों परिवारों के साथ विकास के पथ पर यात्रा शुरू की है।

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एक और समाचार जो मेरे दिल को छू गयी ...एक और पिंकी ने दिखाया कमाल....


राष्ट्रपति को भाया पिंकी का पाउच पर्स

Mar 09, 04:11 pm

नई दिल्ली। कहते हैं न कि एक न दिन तो घूरे के दिन भी फिरते हैं, सो फिर गए घूरे के दिन और वह उठकर और कहीं नहीं सीधे पहुंच गया राष्ट्रपति भवन।

पिंकी की नन्हीं-नन्हीं उंगलियों से जिस घूरे यानी कूड़े के दिन फिरे वो है सड़कों के किनारे यहां-वहां बिखरे रहने वाले पान मसाले के खाली पाउच और प्लास्टिक की थैलियां। पिंकी ने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के लिए पान मसाले के खाली पाउचों को स्नेह और हसरतों से गूंथ-गूंथ कर बनाया और चमचमाता पर्स उन्हें भेंट किया तो राष्ट्रपति भाव-विभोर हो गई और पिंकी को गले लगा लिया।

दरअसल दसवीं की परीक्षा की तैयारी कर रही छत्तीसगढ़ की पिंकी ने राष्ट्रपति को खत लिखकर बताया था कि कैसे उसका भाई सड़कों पर पड़े पान मसालों के पाउचों और प्लास्टिक की थैलियों को इकट्ठा करता है और फिर वह उन्हें धो-सुखाकर किस तरह गूंथकर दरियों, पायदान व पर्स आदि की शक्ल देता है। उसने यह भी लिखा कि वह इस तरह रोजी तो कमाती ही है साथ ही प्लास्टिक के कचरे को ठिकाने लगाने में भी योगदान दे रही है।

पिंकी के इस पत्र से राष्ट्रपति इतनी प्रभावित हुई कि उन्होंने उसे राष्ट्रपति भवन आकर उनसे मिलने का न्यौता दिया और वह भी अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर। इस मौके पर राष्ट्रपति ने पिंकी को दस हजार रूपये का इनाम दिया और साथ ही उसे इसे रोजगार के रूप में अपनाने में मदद का आश्वासन भी दिया। स्वयं राष्ट्रपति भवन आकर राष्ट्रपति से मिलने और स्वयं सहायता समूह के माध्यम से अपने इस हुनर को रोजी-रोटी का जरिया बनाने के लिए राष्ट्रपति द्वारा दी गई मदद की खुशी पिंकी के चेहरे से साफ छलक रही थी।

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वैसे आपलोगों को जल्द हिन् कुछ और ऐसे किस्सों से हम रूबरू करवाएंगे ... सबको महिला दिवस की शुभकामनाएंें और आयिए हम संकल्प करें की किसी भी जरुरत मंद महिला या बच्ची को हर संभव सहायता दें और उन्हें सफलता के मार्ग की और प्रसस्त्र करें ...

Wednesday, December 03, 2008

तुकाराम आम्ब्ले को मेरा सलाम

सिपाही के पद से हाल हिन् में पदोनत्ति प्राप्त कर जमादार (ASI) बने तुकाराम जी ने वीरता की ऐसी मिसाल कायम की, उन्हें युगों-युगों तक याद किया जायेगा। ऐसे जांबाज बहादुरों की कमी नही है हमारे देश में ... पर अफ़सोस हम जनता और हमारी सरकार ऐसे कर्मठ और जांबाज लोगों को भूल जाते हैं , उनके परिजनों का कोई ध्यान नही दिया जाता है, खास करके जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं उनके परिवार वालों का ध्यान रखना हमारा फर्ज बनता है

विस्त्रृत समाचार: साभार दैनिक जागरण

गोलियां खाकर भी नहीं छोड़ा आतंकी को

Dec 02, 06:34 pm

मुंबई। औरों की सुरक्षा के लिए जो बंदूक लेकर चलते हैं उनकी जान भी खतरे में पड़ती है। लेकिन कुछ उल्लेखनीय ढंग से वीरगति प्राप्त करते हैं जिन्हें उनके बलिदान के लिए बारंबार याद किया जाता है।

अभी हाल ही में पदोन्नति प्राप्त कर सहायक सब इंस्पेक्टर का दर्जा हासिल करने वाले महाराष्ट्र पुलिस के 48 वर्षीय तुकाराम आंबले मुंबई में आतंकी हमले के दौरान एक हीरो की तरह शहीद हुए हैं। मुंबई आतंकी हमले में उभरकर सामने आए कई वीरतापूर्ण कारनामों में से एक सच्ची कहानी तुकाराम की भी है।

सलाम तुकाराम को जिसकी बहादुरी के कारण मुंबई पुलिस को आतंकी हमले का एकमात्र आतंकी हाथ लग सका है। अपने वाकी टाकी पर 26 नवंबर की रात प्राप्त संदेश के मुताबिक तुकाराम आंबले क्लास्निकोव एसाल्ट राईफल लेकर अंधाधुंध फायरिंग करने वाले आतंकियों का पीछा किया था।

आतंकियों के बारे में संदेश फैल जाने के बाद डीबी नगर पुलिस स्टेशन की टीम ने चौपाठी के लालबत्ती पर नाकाबंदी की। डीबी नगर पुलिस स्टेशन के सहायक इंस्पेक्टर हेमंत भावधनकर ने बताया कि हमें अपहृत स्कोडा कार पर दो आंतकियों के आने की सूचना मिली थी। हमने सूचना पाने के तत्काल बाद ही दक्षिण मुंबई में स्थित गीरगांव चौपाठी पर नाकाबंदी की।

उन्होंने कहा कि सूचना मिलने के कुछ देर बाद ही हमने देखा कि जिस तरह के कार का ब्यौरा दिया गया था। नाकाबंदी से 50 फीट दूर पर अपनी गति को कम कर लिया है क्योंकि यह कार यू टर्न लेने की कोशिश कर रही थी। इस प्रक्रिया में वह रोड डिवाइडर से भी टकराई। इसके बाद कार हमारी ओर आने लगी और अजमल कसाब [गिरफ्तार आतंकी] कार से उतर आया और आत्मसमर्पण करने जैसी मुद्रा में दिखा क्योंकि उसे दोबारा फिर से अंधाधुंध गोलीबारी करनी थी।

अपनी जान की परवाह किए बगैर तुकाराम आंबले कसाब के सामने आ गया और उसने आतंकी के एके 47 राइफल के बैरल को दोनों हाथों से कसकर पकड़ लिया।

तुकारम आंबले की ओर अपने बंदूक की नोक किए हुए कसाब ने ट्रीगर दबा दी। इस बहादुर पुलिसकर्मी ने सारी गोलियों को अपने सीने के अंदर समाने दिया, लेकिन उसने आतंकी के बंदूक के बैरल को नहीं छोड़ा।

गोलियां खाने के बाद तुकाराम गिर पड़ा, लेकिन कसाब [आतंकी] को नहीं छोड़ा। इसके चलते कसाब की गोलियां का शिकार तुकाराम की टीम के अन्य किसी सदस्य को नहीं होना पड़ा।

इस बीच, उसकी टीम के सदस्यों को दूसरे आतंकी इस्माईल को ढेर करने का मौका मिल गया और कसाब को धर दबोचा। इस निर्भय पुलिस कर्मी की बहादुरी के चलते एकमात्र सबूत के तौर मोहम्मद अजमल कसाब इस समय आतंकवाद निरोधक टीम के कब्जे में है। और उससे जांच टीम को मुंबई आतंकी हमले के कई महत्वपूर्ण सुरागों के बारे में जानकरियां मिल रही है।

अबतक प्राप्त जानकारियों के मुताबिक यह आतंकी प्रमुख आतंकी गुट लश्कर-ए-तैयबा के लिए पिछले डेढ़ साल से काम कर रहा था।