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Saturday, December 20, 2008

यूनुस जी को जन्मदिन की ढेरों बधाइयाँ

कल की पहेली का प्रशांत बाबू ने बिल्कुल सही जवाब दिया । आपको इसका इनाम जल्द हिन् मिल जायेगा ...:)

आप हैं ध्वनि तरंगों के ताल पर विविध भारती के संग और मैं हूँ आपका दोस्त यूनुस खान


कौन नही परिचित होगा इस आवाज से, हाँ ये हैं हमारे प्यारे यूनुस खान जी, और आज इनके जम्दीन के अवसर पर हम सभी की तरफ़ से इन्हे ढेरों बधाइयाँ ....

यूनुस जी की रेडियो पर प्रयोगधर्मिता से आप सभी जरुर वाकिफ होंगे, इस बारे में मुझे कुछ कहने की आवस्यकता नहीं है ।
यूनुस जी के इतना सुलझा और सरल इंसान इस दुनिया में अब बहुत हिन् कमलोग हैं । अगर आप मेरी बात से इतेफाक नही रखते हैं तो सुनिए हमारी हाल के संछिप्त मुलाकात का विवरण ...
७ नवम्बर के दोपहर में मुंबई पंहुचा कुछ काम से, फ़िर मैंने सोचा क्यों न कुछ समय निकाल कर यूनुस जी से भी मुलाकात किया जाए । उनको फ़ोन किया तो पता चला की वो किसी रिकॉर्डिंग में व्यस्त हैं शायद शाम तक छुट्टी मिले । शाम को वापस जब मैं काम करने के बाद तक़रीबन ७.३० pm बजे यूनुस जी को फ़ोन किया तो वो अँधेरी में थे और मैं बोरीवली में । उन्होंने कहा की रुको मैं आ रहा हूँ , तुम axis बैंक के ATM के नजदीक इन्तेजार करना । मेरी गाड़ी बोरीवली से ९.१६ pm पर थी ।
यूनुस जी दौड़ते- भागते ८.४० पर आए । फ़िर बस क्या था हम दोनों वहीँ स्टेशन पर थोड़ा जगह देख कर बैठ गए और ९.१४ तक बात करते रहे । ज्यादातर बातचीत मुंबई धमाकों में मारे गए आमलोगों और हमारे द्विअर्थी समाज के बारे में थी, वो बातें कभी और ... मुझे पता हिन् नही चला की कब ९.१४ हुआ तब यूनुस जी ने बोला भाई भागो वरना गाड़ी छुट जायेगी । अगले दिन हिन् अहमदाबाद से पटना जाना था बाढ़-राहत कार्य के लिए , वरना मैं ट्रेन छोड़ देता ....तो एक और मुलाकात के वादे के साथ यूनुस जी विदा लिया । पुरे रास्ते मैं यूनुस जी की सादगी के बारे में हिन् सोचता रहा ....उनके साथ बिताया एक-एक पल आपको कुछ नया और अलग समाज में करने की प्रेरणा देता है....

अगर आप अभी तक नहीं मिले हैं यूनुस जी से तो जीवन में कम से कम एक बार जरुर मिलिए फ़िर आपका मन बार-बार मिलने का करने लगेगा ....

यूनुस जी के जन्मदिन के अवसर पर उनकी कुछ तस्वीरें :


यूनुस जी ऑटो के ऊपर अपना हाथ साफ़ करते हुए

यूनुस जी अपना प्रिय कार्य करते हुए

सभी फनों में महारत है भाई यूनुस जी की ...

यूनुस जी अपने खाने की बारी का इन्तेजार करते हुए

चित्र सन्दर्भ : सभी चित्र यूनुस जी का ब्लॉग और विविध भारती वेबसाइट से लिए गए हैं ।

Sunday, August 26, 2007

कर्मेंदु शिशिर जी के जन्मदिन पर विशेष प्रस्तुती

कर्मेंदु शिशिर जी का जन्म २६ अगस्त १९५३ को हुआ थाये हिंदी के जानेमाने कथाकार, आलोचक और शोधार्थीहैंजन्मदिन कि ढ़ेर सारी शुभकामनाएं हमारी तरफ से ..... । ये अभी फिलहाल पटना में रहते हैं ।
आएये आज इस अवसर पे पढते हैं उनकी कुछ कवितायेँ .......

कुछ आदिवासी गीत
()
हे प्रिये
ऐसा लग रहा है
मेरा ह्रदय धीरे-धीरे पिघल रहा है
मेरी आत्मा के अतल में
आज भी मौजूद हैं
युवा हलचलों से भारी स्मृतियां
पेड पर पनपी अनगिन कंछियां !

()
हे प्रिये
तुम्हारे ह्रदय को जीत लिया है किसी ने
कहीं और राम गया है तेरा मन
बिसर चुकी हो सारी स्मृतियां
लताएं बहती हैं
इधर-उधर
हदों के पार तक

()
हे प्रिये
तुम्हें याद नहीं
कभी मुड़कर भी नहीं देखा
वो घरोंदे
धूल-मिट्टी कि दुनिया में
बचपन की गृहस्थी
खाना बनाने का कौतुक
कुछ भी तुम्हें याद नहीं
वह देखो
किस तरह अरण्य में खो चुका है सब-कुछ!

()

हे प्रिये
पूरा जंगल, पूरा पृथ्वी, पूरा आकाश
कहीं तुम्हें देख नहीं पाता मैं
प्रेम कि डोर थी
आख़िर क्यों तोड़ दी तुमने
देखो-वहां देखो
भयंकर बाढ़ में बहते चले जाते
बचपन को
हम दोनों की विपुल किलकारियाँ
सपनों को-बहते हुए देखो
यह नहीं
आख़िर क्यों बहती रहती है-रात-दिन!

()

हे प्रिये
मेरे भीतर जेठ तप रहा है
सचमुच दूर हो रही हो तुम
उजाड़-सा लगता है वन
एक हुक उठती है भीतर से
फैलती, दबोचती है अंदर -बाहर
ठहरे हुए समय में
आख़िर कैसे गुजरता है जीवन?

Friday, August 24, 2007

रामधारी सिंह "दिनकर"


रामधारी सिंह "दिनकर का जन्म 23 अगस्त १९०८ को हुआ था
जन्म स्थान: ग्राम सिमरिया, जिला बेगूसराय, बिहारज्यादा जानकारी के लिये यहाँ देखें

मैं न वह जो स्वपन पर केवल सही करते
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ
और उसपर नींव रखता हूँ नये घर की
इस तरह दीवार फ़ौलादी उठाता हूँ ।
- दिनकर

आइये तो करते हैं उनके द्वारा लिखी गयी रचनाओं का पाठ ।

आग की भीख

धुन्धली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा,
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है,
मुहँ को छिपा तिमिर मेन कयोन तेज सो रहा है ?

दाता पुकर मेरि, संदीप्ति को जिला दे,
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे,
प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ
चढती जवानियों का श्रृंगार माँगता हूँ

बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?
मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश रहा है या सौभग्य का सितरा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदर्ष्ट मेरा,
भगवान, इस तरी को भरमा दे अँधेरा
तमवेधिनी किरण का संधन माँगता हूँ
धुर्व की कठिन घडि में, पहचान माँगता हूँ

आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,
बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ ढेर हो रहा है,
है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है!
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है,
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।
जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।

मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है,
अरमानआरज़ू की लाशें निकल रही हैं।
भीगीखुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं,
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं,
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।

आँसूभरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
मेरे शमशान में आ श्रंगी जरा बजा दे।
फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे,
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे,
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।
बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।

ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे,
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे
हम दे चुके लहू हैं, तू देवता विभा दे,
अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ।
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ


अन्य रचनाओं के लिये यहाँ देखें