Wednesday, August 01, 2007

असत्याभास(Paradox) क्या है ?

वह बात जो कि वास्तव में सच हो पर देखने में झूठा लगे उसे असत्याभास कहते । तो आइये आज करते हैं ऐसे हिन् कुछ
असत्याभास के बारे में बातचीत.....
  1. रुस्सेल्ल(Russell) असत्याभास: "O is a member of O, if and only if, O is not a member of O." This is known as Russell's paradox. " 'क' सदस्य है 'क' का, अगर 'क' सदस्य नही है 'क' का "। शायद आपको ये पढ़ कर नही सही लग रहा होगा पर अगर आप थोडा समुच्चय सिद्धांत का अध्यन करें तो पता चलेगा कि ये बातें सही हैं। बाद में रुस्सेल्ल ने अपने एक आलेख में इसका हल भी बताया। अगर आप वो आलेख पढना चाहते हैं तो मुझे पत्र लिखिए। यह आलेख JSTOR पे उपलब्ध है... Mathematical Logic as Based on the Theory of Types
  2. जनम्दीन(Birthday) असत्याभास: अगर हम २३ लोगों का यादृच्छिकता से(randomly) चयन करते हैं तो हमेशा ५० % प्रायिकता(सम्भावना) होगी कि लोगों का जनम्दीन एक हिन् होगा५० लोगों के समुह में प्रायिकता ९७ % और १०० लोगों के लिए तो ये बढ कर ९९.९९९६ % तक पहुच जाती हैहै ना अस्चार्य वाली बातअगर आप ज्यादा जानना चाहते हैं इस बारे में तो गूगल में खोजिये ना "Birthday Paradox".

आने वाले समय में और भी हम बातें करेंगे ऐसे हिन् अन्य प्रसिद्ध प्रायिकता के बारे में । अपने विचार जरुर प्रस्तुत किज्येगा इस आलेख के बारे में कैसा लगा आपलोगों को.......

प्रेमचन्द

प्रेमचंद जी के जनम्दिवास पे कुछ खास सामग्री तो नही ला पायाचलिये थोड़ी देर से हिन् सही नागार्जुन जी के द्वारा लिखी गयी प्रेमचंद कि जीवनी आपलोग के सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ
















Friday, June 22, 2007

एक किवता सन् 1857 की आजादी के समय का

हम हैं इसके मािलक, िहनदुस्तान हमारा
पाक वतन है कौम का, जन्नत से भी प्यारा
ये हैं हमिर िमल्िकयत, िहनदुस्तान हमारा
इसकी रुहािनयत से, रोशन है जग सारा
िकतना कदीम िकतना -ईम, सब दुिनया से न्यारा
आया िफ़रंगी दूर से, ऐसा मंतर मारा
लूटा दोनो हाथों से, प्यारा वतन हमारा
आज शहीदों नें है तुमको, अहले-वतन ललकारा
तोड़ो गुलामी की जंजीरं, बरसाओ अंगारा
िहंदु-मुसलमं-िसख हमारा, भाई-भाई प्यारा
यह हैं आजादी का झंडा, इसे सलाम हमारा ।।

Wednesday, April 11, 2007

Saturday, March 24, 2007

बच्चू बाबू

बच्चू बाबू एम.ए. करके सात साल झख मारे
खेत बेंचकर पढ़े पढ़ाई उल्लू बने बिचारे

कितनी अर्ज़ी दिए न जाने कितना फूँके तापे
कितनी धूल न जाने फाँके कितना रस्ता नापे

लाई चना कहीं खा लेते कहीं बेंच पर सोते
बच्चू बाबू हूए छुहारा झोला ढोते-ढोते

उमर अधिक हो गई नौकरी कहीं नहीं मिल पाई
चौपट हुई गिरस्ती बीबी देने लगी दुहाई

बाप कहे आवारा भाई कहने लगे बिलल्ला
नाक फुला भौजाई कहती मरता नहीं निठल्ला

खून ग़‍रम हो गया एक दिन कब तक करते फाका
लोक लाज सब छोड़-छाड़कर लगे डालने डाका

बड़ा रंग है, बड़ा मान है बरस रहा है पैस

-सौजन्य युनुस िज