Friday, December 19, 2008

पहचान कौन ?


यह तस्वीर मैंने बिना अनुमति के चुरायी है , सर्वप्रथम इसके लिए माफ़ी चाहूँगा । पर इस तस्वीर पर आधारित एक पहेली है सभी ब्लॉगर भाई-बहनों के लिए ....

क्या आपलोग पहचान सकते हैं यह तस्वीर किस महाशय की है ?

अपना जवाब कल दोपहर से पहले कमेन्ट में लिखें । कल होगी थोडी लम्बी बातचीत इनके ऊपर, तबतक रखते हैं थोड़ा सा Suspense...

Saturday, December 06, 2008

बाढ़ की विभीषिका अभी खत्म नहीं हुई है बिहार में ...

बाढ़ की विभीषिका अभी खत्म नहीं हुई है , ये अलग बात है की हमारे समाचार पत्रों और मीडिया से बिहार के बाढ़ के बारे में रिपोर्ट आना बंद हो गया....पर स्तिथि अब भी उतनी हिन् कारुणिक है , जैसे-जैसे ठंढ बढ़ रही है स्तिथि और खराब हो रही है, कैसे सामना करेंगे ये गरीब जिनके तन पर कोई वस्त्र नहीं है वो इस भीषण ठंढ ka. और इस बात को ध्यान में रखते हुए हम लोगों ने कम्बल बाटने के काम को पिछले महीने से सर्वोच प्राथमिकता दी है . पिछले महीने में तकरीबन हजार कम्बल ka वितरण किया गया है, हम लोगों ने ये पक्का किया है की एक-एक कम्बल जरुरत मंद को सीधा मिले. और इस काम को सार्थक बनाने में जुड़े हैं श्रीकांत भैया और चन्दन जी . इन दोनों व्यक्तियों ने पिछले महीने से अपना सर्वस्व बिहार बाढ़ रहत कार्य में हिन् लगा दिया है . इनकी जितनी भी तारीफ़ की जाए काम होगी....
पर हमलोगों ka ये प्रयास सागर में एक बूँद के सामान होगा ...और लोगों को आगे आने की जरुरत है ....

हमलोगों के पुरे बाढ़ सहायता कार्य की जानकारी के लिए ये ब्लॉग देखें

Wednesday, December 03, 2008

तुकाराम आम्ब्ले को मेरा सलाम

सिपाही के पद से हाल हिन् में पदोनत्ति प्राप्त कर जमादार (ASI) बने तुकाराम जी ने वीरता की ऐसी मिसाल कायम की, उन्हें युगों-युगों तक याद किया जायेगा। ऐसे जांबाज बहादुरों की कमी नही है हमारे देश में ... पर अफ़सोस हम जनता और हमारी सरकार ऐसे कर्मठ और जांबाज लोगों को भूल जाते हैं , उनके परिजनों का कोई ध्यान नही दिया जाता है, खास करके जो लोग आर्थिक रूप से कमजोर हैं उनके परिवार वालों का ध्यान रखना हमारा फर्ज बनता है

विस्त्रृत समाचार: साभार दैनिक जागरण

गोलियां खाकर भी नहीं छोड़ा आतंकी को

Dec 02, 06:34 pm

मुंबई। औरों की सुरक्षा के लिए जो बंदूक लेकर चलते हैं उनकी जान भी खतरे में पड़ती है। लेकिन कुछ उल्लेखनीय ढंग से वीरगति प्राप्त करते हैं जिन्हें उनके बलिदान के लिए बारंबार याद किया जाता है।

अभी हाल ही में पदोन्नति प्राप्त कर सहायक सब इंस्पेक्टर का दर्जा हासिल करने वाले महाराष्ट्र पुलिस के 48 वर्षीय तुकाराम आंबले मुंबई में आतंकी हमले के दौरान एक हीरो की तरह शहीद हुए हैं। मुंबई आतंकी हमले में उभरकर सामने आए कई वीरतापूर्ण कारनामों में से एक सच्ची कहानी तुकाराम की भी है।

सलाम तुकाराम को जिसकी बहादुरी के कारण मुंबई पुलिस को आतंकी हमले का एकमात्र आतंकी हाथ लग सका है। अपने वाकी टाकी पर 26 नवंबर की रात प्राप्त संदेश के मुताबिक तुकाराम आंबले क्लास्निकोव एसाल्ट राईफल लेकर अंधाधुंध फायरिंग करने वाले आतंकियों का पीछा किया था।

आतंकियों के बारे में संदेश फैल जाने के बाद डीबी नगर पुलिस स्टेशन की टीम ने चौपाठी के लालबत्ती पर नाकाबंदी की। डीबी नगर पुलिस स्टेशन के सहायक इंस्पेक्टर हेमंत भावधनकर ने बताया कि हमें अपहृत स्कोडा कार पर दो आंतकियों के आने की सूचना मिली थी। हमने सूचना पाने के तत्काल बाद ही दक्षिण मुंबई में स्थित गीरगांव चौपाठी पर नाकाबंदी की।

उन्होंने कहा कि सूचना मिलने के कुछ देर बाद ही हमने देखा कि जिस तरह के कार का ब्यौरा दिया गया था। नाकाबंदी से 50 फीट दूर पर अपनी गति को कम कर लिया है क्योंकि यह कार यू टर्न लेने की कोशिश कर रही थी। इस प्रक्रिया में वह रोड डिवाइडर से भी टकराई। इसके बाद कार हमारी ओर आने लगी और अजमल कसाब [गिरफ्तार आतंकी] कार से उतर आया और आत्मसमर्पण करने जैसी मुद्रा में दिखा क्योंकि उसे दोबारा फिर से अंधाधुंध गोलीबारी करनी थी।

अपनी जान की परवाह किए बगैर तुकाराम आंबले कसाब के सामने आ गया और उसने आतंकी के एके 47 राइफल के बैरल को दोनों हाथों से कसकर पकड़ लिया।

तुकारम आंबले की ओर अपने बंदूक की नोक किए हुए कसाब ने ट्रीगर दबा दी। इस बहादुर पुलिसकर्मी ने सारी गोलियों को अपने सीने के अंदर समाने दिया, लेकिन उसने आतंकी के बंदूक के बैरल को नहीं छोड़ा।

गोलियां खाने के बाद तुकाराम गिर पड़ा, लेकिन कसाब [आतंकी] को नहीं छोड़ा। इसके चलते कसाब की गोलियां का शिकार तुकाराम की टीम के अन्य किसी सदस्य को नहीं होना पड़ा।

इस बीच, उसकी टीम के सदस्यों को दूसरे आतंकी इस्माईल को ढेर करने का मौका मिल गया और कसाब को धर दबोचा। इस निर्भय पुलिस कर्मी की बहादुरी के चलते एकमात्र सबूत के तौर मोहम्मद अजमल कसाब इस समय आतंकवाद निरोधक टीम के कब्जे में है। और उससे जांच टीम को मुंबई आतंकी हमले के कई महत्वपूर्ण सुरागों के बारे में जानकरियां मिल रही है।

अबतक प्राप्त जानकारियों के मुताबिक यह आतंकी प्रमुख आतंकी गुट लश्कर-ए-तैयबा के लिए पिछले डेढ़ साल से काम कर रहा था।

Monday, December 01, 2008

एनएसजी कमांडो के हीरो: हनीफ

जो कुछ भी मुंबई में हुआ वो बुरा हुआ, निंदनीय है इस बात से सभी सहमत है । पर जो इसके बाद राजनितिक पार्टियां कर रही है और मीडिया कर रही है वो भी कहीं से सही नही है । लोग समस्या के ऊपर विचार करने के बजाय एक दुसरे पर कीचड़ उछालने में लगे हैं। इंडिया टीवी ने तो अबतक स्वर्ग की सैर हिन् करवाई थी इस बार तो उन्होंने इन आतंकवादियों से सीधा LIVE बातचीत भी सुनवाया !! कुछ लोग हैं जो इस घटना को एक सांप्रदायिक रंग देने में भी लगे हैं ।

उन सभी के मुह पर तमाचा जड़ता है ये एक युवा: हनीफ जो नरीमन हाउस के पास आइसक्रीम बेचने का काम करता हैं। आप खुद हिन् पढिये और अंदाजा lagayie हनीफ की बहादुरी का,

प्रस्तुति साभार : बीबीसी हिन्दी

मुंबई के नरीमन हाउस में चरमपंथी हमलों के बाद एनएसजी के कमांडो के साथ फोटो तो कई लोग खिंचवा रहे थे लेकिन ये कमांडो जिसके साथ फ़ोटो खिंचवा रहे थे वो हनीफ़ शेख थे.

हनीफ़ नरीमन हाउस के बाहर ही आइसक्रीम की दुकान चलाते हैं लेकिन जब नरीमन हाउस में चरमपंथी आए तो उसके बाद पुलिस और कमांडोज़ को चप्पे चप्पे की जानकारी देने और नरीमन हाउस भवन तक ले जाने का काम हनीफ़ ने ही किया था.

रविवार को लोगों के आइसक्रीम के आर्डरों के बीच बात करते हुए हनीफ़ ने कहा, "असल में क्या है न. मैं इधर का ही रहनेवाला हूँ. मेरेको सभी बिल्डिंग के बारे में पता है. कैसा बना है वो. कैसा जाना है उसमें इसलिए पुलिस जब आई तो लोगों ने मेरा नाम बोला. फिर मैं न पेड़ पर बहुत जल्दी चढ़ पाता हूं इसलिए इधर मुझे लोग जानते भी हैं."

नरीमन हाउस एक सँकरी गली में तीन चार इमारतों के बीच घिरा हुआ है. पहले हनीफ़ पुलिस को वहां लेकर गए और बाद में कमांडो को भी.

वो बताते हैं, "पुलिस तो रात में थी. मैं उनको पहुँचा कर वापस आ गया लेकिन सुबह में कमांडो आए तो मैंने उनको पहले इमारत का नक्शा बना कर दिया. इससे वो बहुत खुश हुए और मुझे साथ लेकर गए. हम लोग नीचे थे और चरमपंथी तीसरे और चौथे माले पर थे."

कमांडो की उस बटालियन के हेड मेरे पास आए और बोले कि हनीफ़ तू नहीं होता तो ये मिशन कामयाब नहीं होता. ये नरीमन हाउस मुठभेड़ का असली हीरो तू ही है. यहाँ लोग जानते हैं मैंने क्या किया. मेरे लिए यही बहुत है
हनीफ़ शेख़

वो बताते हैं कि इमारत में घुसते ही यहूदी रब्बी की लाश पड़ी थी और कमांडो के अनुसार शायद उन्हें चरमपंथियों ने इमारत में घुसते ही मार डाला था.

हनीफ़ बताते हैं कि उन्होंने एक छोटे बच्चे को बाहर निकालने में मदद की और साथ ही आसपास की इमारतों से भी परिवारों को बाहर निकाल कर सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया.

ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि स्थानीय लोग हनीफ़ को जानते थे.

आख़िरी लड़ाई

नरीमन हाउस की आखिरी लड़ाई शुक्रवार की सुबह शुरु हुई.

इस बारे में वो कहते हैं, "कमांडो ने बता दिया था कि सुबह में हवाई मार्ग से छत पर और कमांडो उतरेंगे तो मैंने उनको बताया कि चरमपंथी छत पर भी गोलियां चलाते हैं इस बात से उनको मदद मिली और जब कमांडो छत पर उतर रहे थे तो नीचे के कमांडोज़ ने कवर फायर दिया."

धीरे-धीरे कार्रवाई तेज़ हुई और नीचे से कमांडो ऊपर की तरफ़ और ऊपर से कमांडोज़ नीचे आए और चरमपंथियों को मार गिराया.

हनीफ़ शेख़
हनीफ़ शेख़ ने नक्शे तक बनाकर एनएसजी को दिए

लेकिन क्या इस भीषण गोलाबारी में हनीफ़ को डर नहीं लगा, इस सवाल पर वो कहते हैं, "डर क्यों नहीं लगेगा अभी इतना गोली चलेगा तो. लेकिन कमांडो मेरे को बोले थे कि तुम्हारी ज़िम्मेदारी मेरी. तुम्हारी सिक्योरिटी हमारा तो मैं थोड़ा निश्चिंत हो गया था."

वो बताते हैं कि दो कमांडो हमेशा उन्हें घेरे में लिए रहते थे और अपना काम करते थे.

हनीफ़ कहते हैं, "वो तो बहुत ज़बर्दस्त काम किए. चरमपंथी लोग लिफ्ट में जाते थे और अलग अलग माले से गोली चलाते थे ताकि लगे कि वो बहुत सारे हैं. कमांडोज़ को ये तकनीक पता थी और उन्होंने लिफ़्ट उड़ा दी. ऐसा दिमाग से काम कर रहे थे ये कमांडो."

नरीमन हाउस जब खाली कराया गया तो कमांडो की तस्वीरें टीवी चैनलों पर प्रसारित की गईं लेकिन उसमें हनीफ़ नहीं दिखे. हनीफ़ को इससे कोई शिकवा नहीं है.

वो कहते हैं, "कमांडो की उस बटालियन के हेड मेरे पास आए और बोले कि हनीफ़ तू नहीं होता तो ये मिशन कामयाब नहीं होता. ये नरीमन हाउस मुठभेड़ का असली हीरो तू ही है. यहाँ लोग जानते हैं मैंने क्या किया. मेरे लिए यही बहुत है. कमांडो लोग अपना जान दिए मैंने तो बस थोड़ी मदद ही की है."

Tuesday, October 28, 2008

कैसे मनाये दिवाली ?

आज है दीपावली के त्यौहार का दिन , जब लोग शान्ति खुशी और समृधि के लिए पूजा करते हैं लक्ष्मी माता का , पर मेरे दोस्त जा कर उस बाप से पूछो जो कुछ दिनों पहले अपना बेटा खोया , राहुल के पिता से पूछो जो इन्तेजार में थे की उनका बेटा ५ हजार के जगह ज्यादा पैसों की नौकरी के साथ आएगा इस दीपावली पर , आसाम में पिछले १ महीने में (घुसपैठी बंगलादेशी और वहां के स्थानीय लोगों के संघर्ष में ) मारे गए लोगों से , या फ़िर बिहार-उडीसा के बाढ़ पीडितों से , या फ़िर उडीसा में दंगे में मारे गए लोगों से , २ महीने पहले अहमदाबाद में हुए धमाकों में मारे गए लोगों से और ना जाने अनगिनत भूखे बेसहारा लोगों से पूछों की वो कैसे मनाएंगे दीपवाली ???

जब हमारा पूरा देश सुलग रहा है तो आप कहते हैं "शुभ दीपावली " नही मेरे दोस्त मैं नही मना सकता ये दीपावली .... देश जल रहा है कुछ नही बहुत कुछ करने की जरुरत है....

ऐसे में शिवमंगल सिंह सुमन की एक कविता याद आ रही है:
मेरा देश जल रहा, कोई नही बुझानेवाला

घर-आंगन में आग लग रही
सुलग रहे वन -उपवन,
दर दीवारें चटख रही हैं
जलते छप्पर- छाजन
तन जलता है , मन जलता है
जलता जन-धन-जीवन,
एक नहीं जलते सदियों से
जकड़े गर्हित बंधन
दूर बैठकर ताप रहा है,
आग लगानेवाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला।


भाई की गर्दन पर
भाई का तन गया दुधारा
सब झगड़े की जड़ है
पुरखों के घर का बँटवारा
एक अकड़कर कहता
अपने मन का हक ले लेंगें,
और दूसरा कहता तिल
भर भूमि बँटने देंगें
पंच बना बैठा है घर में,
फूट डालनेवाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला

दोनों के नेतागण बनते
अधिकारों के हामी,
किंतु एक दिन को भी
हमको अखरी नहीं गुलामी
दानों को मोहताज हो गए
दर-दर बने भिखारी,
भूख, अकाल, महामारी से
दोनों की लाचारी
आज धार्मिक बना,
धर्म का नाम मिटानेवाला
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला

होकर बड़े लड़ेंगें यों
यदि कहीं जान मैं लेती,
कुल-कलंक-संतान
सौर में गला घोंट मैं देती
लोग निपूती कहते पर
यह दिन देखना पड़ता,
मैं बंधनों में सड़ती
छाती में शूल गढ़ता
बैठी यही बिसूर रही माँ,
नीचों ने घर घाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला

भगतसिंह, अशफाक,
लालमोहन, गणेश बलिदानी,
सोच रहें होंगें, हम सबकी
व्यर्थ गई कुरबानी
जिस धरती को तन की
देकर खाद खून से सींचा ,
अंकुर लेते समय उसी पर
किसने जहर उलीचा
हरी भरी खेती पर ओले गिरे,
पड़ गया पाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला

जब भूखा बंगाल,
तड़पमर गया ठोककर किस्मत,
बीच हाट में बिकी
तुम्हारी माँ - बहनों की अस्मत।
जब कुत्तों की मौत मर गए
बिलख-बिलख नर-नारी ,
कहाँ कई थी भाग उस समय
मरदानगी तुम्हारी
तब अन्यायी का गढ़ तुमने
क्यों चूर कर डाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला।


पुरखों का अभिमान तुम्हारा
और वीरता देखी,
राम - मुहम्मद की संतानों !
व्यर्थ मारो शेखी
सर्वनाश की लपटों में
सुख-शांति झोंकनेवालों !
भोले बच्चें, अबलाओ के
छुरा भोंकनेवालों !
ऐसी बर्बरता का
इतिहासों में नहीं हवाला,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला

घर-घर माँ की कलख
पिता की आह, बहन का क्रंदन,
हाय , दूधमुँहे बच्चे भी
हो गए तुम्हारे दुश्मन ?
इस दिन की खातिर ही थी
शमशीर तुम्हारी प्यासी ?
मुँह दिखलाने योग्य कहीं भी
रहे भारतवासी।
हँसते हैं सब देख
गुलामों का यह ढंग निराला
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला।


जाति-धर्म गृह-हीन
युगों का नंगा-भूखा-प्यासा,
आज सर्वहारा तू ही है
एक हमारी आशा
ये छल छंद शोषकों के हैं
कुत्सित, ओछे, गंदे,
तेरा खून चूसने को ही
ये दंगों के फंदे
तेरा एका गुमराहों को
राह दिखानेवाला ,
मेरा देश जल रहा,
कोई नहीं बुझानेवाला

साभार: कविता कोष