Wednesday, August 22, 2007

हरिशंकर परसाई के जन्मदिन पर विशेष

हरिशंकर परसाई जी का जन्म २२ अगस्त, १९२४ को जमानी गाँव, जिला होशंगाबाद(मध्य प्रदेश ) में हुआ था ।
आज सुबह से हिन् इक्षा थी कि कुछ लिखा जाये परसाई जी के बारे में , अभी जा के समय मिला है ।

रचना की मूल अंतर्वस्तु और उसके भाषा-शिल्प-दोनों ही स्टारों पर परसाई जी जनता के रचनाकार थे । चाहे भाषा या भूषा का सवाल हो, चाहे धर्म, संस्कृति , कला, साहित्य अथवा प्रदेश का-उन्होने उन पर व्यापक जनोंमुख नजरिए से विचार किया । औपने बेजोड़ व्यंगात्मक तेवर के सहारे अपनी समूची समकालीनता को खंघालते हुए पाठकीय मानस को जाग्रत और परिष्कृत करने की जैसी कोशिश उनके यहाँ मिलती है, वैसी इधर समूचे भारतीय साहित्य में दुर्लभ है ।


--साभार राजकमल पर्काशन

Monday, August 20, 2007

एक गधे की आत्मकथा


कृष्ण चंदर के लोकप्रिय उपन्यास "एक गधे की आत्मकथा " में आदमी की भाषा में बोलने वाले एक गधे के माध्यम से समाज के विभिन्न पहलुओं पर करारा व्यंग्य किया गया है । इस उपन्यास के विचित्र संसार में सरकारी दफ्तरों के निठल्ले आफिसर, लाइसेंस के चक्कर में घूमने वाले व्यवसायी, चुनाव के जोड़-तोड़ में लगे नेता, साहित्य के मठाधीश , माडर्न आर्ट के नम पर जनता को चक्कर में डालने वाले कलाकार, अपने ही सुर से मोहित संगीतज्ञ, सौंदर्य के नम पर भोंदेपन को अपनाने वाली निठ्ल्ली महिलाएँ मानो कार्टून कि शक्ल में चलते फिरते नजर आते हैं ।

एक बहुत हिन् बेहतरीन पुस्तक है, एक बार अवश्य हिन् पढ़ें । वर्तमान परिवेश के बारे में एकदम सटीक चित्रण है इस पुस्तक में। कहानी के अंत में थोड़ी पकड़ ढीली हो गयी है फिर भी बार - बार पढने लायक पुस्तक हैं ।

Wednesday, August 15, 2007

क्या है आजादी : एक नजर - भाग 1

क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है जिन्हे एक पहिया ढोता है या इसका कोई खास मतलब होता है ।
- धूमिल
आएये देखते हैं हमारे यहाँ के भिन्न-भिन्न वर्ग के लोग क्या सोचते हैं आजादी के बारे में ......

बनवारी गौतम, हाथ रिक्शाचालक, कोलकाता ..........

आजादी से हमें क्या लेना-देना ? हमारे दिमाग में तो हर अगली ख़ुराक के लिए रोटी जुगाडने कि चिन्ता है । हमारे पुरखों कि पुरी उर्जा रिक्शा पर लदे इंसानी भार को ढोने खर्च होती थी और अब हम भी यही कर रहे हैं । हम कभी अपनी फतेहलिसे उबार नहीं पाये । रोटियों कि चिन्ता गयी हिन् नही तो कहॉ से मालूम होगा आजादी का मर्म ?

ये आलेख कादम्बिनी में छपा है और मैं इसका बाकी का भाग जल्द हिन् आपलोगों के सामने प्रस्तुत करुँगा। तो तबतक करें हम और आप मंथन कि क्या सही में आजादी हमारे यहाँ सारे वर्ग के लोगों को मिल गयी है या केवल एक खास वर्ग को मिली है , और अगर आपका उत्तर है हाँ तो क्या हम और आप नही जिम्मेदार हैं कहीं इस वर्तमान व्यवस्था के लिए ........

- साभार कादम्बिनी

Tuesday, August 14, 2007

वीर




सच् है , विपत्ति जब आती है ,
कायर को ही दहलाती है ,
सूरमा नहीं विचलित होते ,
क्षण एक नहीं धीरज खोते ,
विघ्नों को गले लगते हैं ,
कांटों में राह बनाते हैं ।

मुहँ से न कभी उफ़ कहते हैं ,
संकट का चरण न गहते हैं ,
जो आ पड़ता सब सहते हैं ,
उद्योग - निरत नित रहते हैं ,
शुलों का मूळ नसाते हैं ,
बढ़ खुद विपत्ति पर छाते हैं ।

है कौन विघ्न ऐसा जग में ,
टिक सके आदमी के मग में ?
ख़म ठोंक ठेलता है जब नर
पर्वत के जाते पाव उखड़ ,
मानव जब जोर लगाता है ,
पत्थर पानी बन जाता है ।

गुन बड़े एक से एक प्रखर ,
हैं छिपे मानवों के भितर ,
मेंहदी में जैसी लाली हो ,
वर्तिका - बीच उजियाली हो ,
बत्ती जो नहीं जलाता है ,
रोशनी नहीं वह पाता है ।


- रामधारी िसंह "दिनकर"



Monday, August 13, 2007

वीर तुम बढे चलो


वीर तुम बढे चलो ।
धीर तुम बढे चलो ।।

हाथ में ध्वजा रहे ,
बाल - दल सजा रहे ,
ध्वज कभी झुके नहीं ,
दल कभी रुके नहीं ।

वीर तुम बढे चलो ।
धीर तुम बढे चलो ।।

सामने पहाड़ हो ,
िसंह की दहाड़ हो ,
तुम िनडर हटो नहीं,
तुम िनडर डटो वहीं ।

वीर तुम बढे चलो ।
धीर तुम बढे चलो ।।

मेघ गरजते रहें
मेघ बरसते रहें
िबजिलयाँ कड़क उठें
िबजिलयाँ तड़क उठें

वीर तुम बढे चलो
धीर तुम बढे चलो

प्रात हो िक रात हो
संग हो ना साथ हो
सुर्या से बढे चलो
चंद्र से बढे चलो ।

वीर तुम बढे चलो
धीर तुम बढे चलो

-द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी